حِينَئِذٍ جَمَعَ سُلَيْمَانُ شُيُوخَ إِسْرَائِيلَ وَكُلَّ رُؤُوسِ ٱلْأَسْبَاطِ، رُؤَسَاءَ ٱلْآبَاءِ مِنْ بَنِي إِسْرَائِيلَ إِلَى ٱلْمَلِكِ سُلَيْمَانَ فِي أُورُشَلِيمَ، لِإِصْعَادِ تَابُوتِ عَهْدِ ٱلرَّبِّ مِنْ مَدِينَةِ دَاوُدَ، هِيَ صِهْيَوْنُ.١1
तब सुलैमान ने इस्राएली पुरनियों को और गोत्रों के सब मुख्य पुरुषों को भी जो इस्राएलियों के पूर्वजों के घरानों के प्रधान थे, यरूशलेम में अपने पास इस मनसा से इकट्ठा किया, कि वे यहोवा की वाचा का सन्दूक दाऊदपुर अर्थात् सिय्योन से ऊपर ले आएँ।
فَٱجْتَمَعَ إِلَى ٱلْمَلِكِ سُلَيْمَانَ جَمِيعُ رِجَالِ إِسْرَائِيلَ فِي ٱلْعِيدِ فِي شَهْرِ أَيْثَانِيمَ، هُوَ ٱلشَّهْرُ ٱلسَّابِعُ.٢2
अतः सब इस्राएली पुरुष एतानीम नामक सातवें महीने के पर्व के समय राजा सुलैमान के पास इकट्ठे हुए।
وَجَاءَ جَمِيعُ شُيُوخِ إِسْرَائِيلَ، وَحَمَلَ ٱلْكَهَنَةُ ٱلتَّابُوتَ.٣3
जब सब इस्राएली पुरनिये आए, तब याजकों ने सन्दूक को उठा लिया।
وَأَصْعَدُوا تَابُوتَ ٱلرَّبِّ وَخَيْمَةَ ٱلِٱجْتِمَاعِ مَعَ جَمِيعِ آنِيَةِ ٱلْقُدْسِ ٱلَّتِي فِي ٱلْخَيْمَةِ، فَأَصْعَدَهَا ٱلْكَهَنَةُ وَٱللَّاوِيُّونَ.٤4
और यहोवा का सन्दूक, और मिलापवाले तम्बू, और जितने पवित्र पात्र उस तम्बू में थे, उन सभी को याजक और लेवीय लोग ऊपर ले गए।
وَٱلْمَلِكُ سُلَيْمَانُ وَكُلُّ جَمَاعَةِ إِسْرَائِيلَ ٱلْمُجْتَمِعِينَ إِلَيْهِ مَعَهُ أَمَامَ ٱلتَّابُوتِ، كَانُوا يَذْبَحُونَ مِنَ ٱلْغَنَمِ وَٱلْبَقَرِ مَا لَا يُحْصَى وَلَا يُعَدُّ مِنَ ٱلْكَثْرَةِ.٥5
और राजा सुलैमान और समस्त इस्राएली मंडली, जो उसके पास इकट्ठी हुई थी, वे सब सन्दूक के सामने इतने भेड़ और बैल बलि कर रहे थे, जिनकी गिनती किसी रीति से नहीं हो सकती थी।
وَأَدْخَلَ ٱلْكَهَنَةُ تَابُوتَ عَهْدِ ٱلرَّبِّ إِلَى مَكَانِهِ فِي مِحْرَابِ ٱلْبَيْتِ فِي قُدْسِ ٱلْأَقْدَاسِ، إِلَى تَحْتِ جَنَاحَيِ ٱلْكَرُوبَيْنِ،٦6
तब याजकों ने यहोवा की वाचा का सन्दूक उसके स्थान को अर्थात् भवन के पवित्र-स्थान में, जो परमपवित्र स्थान है, पहुँचाकर करूबों के पंखों के तले रख दिया।
لِأَنَّ ٱلْكَرُوبَيْنِ بَسَطَا أَجْنِحَتَهُمَا عَلَى مَوْضِعِ ٱلتَّابُوتِ، وَظَلَّلَ ٱلْكَرُوبَانِ ٱلتَّابُوتَ وَعِصِيَّهُ مِنْ فَوْقُ.٧7
करूब सन्दूक के स्थान के ऊपर पंख ऐसे फैलाए हुए थे, कि वे ऊपर से सन्दूक और उसके डंडों को ढाँके थे।
وَجَذَبُوا ٱلْعِصِيَّ فَتَرَاءَتْ رُؤُوسُ ٱلْعِصِيِّ مِنَ ٱلْقُدْسِ أَمَامَ ٱلْمِحْرَابِ وَلَمْ تُرَ خَارِجًا، وَهِيَ هُنَاكَ إِلَى هَذَا ٱلْيَوْمِ.٨8
डंडे तो ऐसे लम्बे थे, कि उनके सिरे उस पवित्रस्‍थान से जो पवित्र-स्थान के सामने था दिखाई पड़ते थे परन्तु बाहर से वे दिखाई नहीं पड़ते थे। वे आज के दिन तक यहीं वर्तमान हैं।
لَمْ يَكُنْ فِي ٱلتَّابُوتِ إِلَّا لَوْحَا ٱلْحَجَرِ ٱللَّذَانِ وَضَعَهُمَا مُوسَى هُنَاكَ فِي حُورِيبَ حِينَ عَاهَدَ ٱلرَّبُّ بَنِي إِسْرَائِيلَ عِنْدَ خُرُوجِهِمْ مِنْ أَرْضِ مِصْرَ.٩9
सन्दूक में कुछ नहीं था, उन दो पटियाओं को छोड़ जो मूसा ने होरेब में उसके भीतर उस समय रखीं, जब यहोवा ने इस्राएलियों के मिस्र से निकलने पर उनके साथ वाचा बाँधी थी।
وَكَانَ لَمَّا خَرَجَ ٱلْكَهَنَةُ مِنَ ٱلْقُدْسِ أَنَّ ٱلسَّحَابَ مَلَأَ بَيْتَ ٱلرَّبِّ،١٠10
१०जब याजक पवित्रस्‍थान से निकले, तब यहोवा के भवन में बादल भर आया।
وَلَمْ يَسْتَطِعِ ٱلْكَهَنَةُ أَنْ يَقِفُوا لِلْخِدْمَةِ بِسَبَبِ ٱلسَّحَابِ، لِأَنَّ مَجْدَ ٱلرَّبِّ مَلَأَ بَيْتَ ٱلرَّبِّ.١١11
११और बादल के कारण याजक सेवा टहल करने को खड़े न रह सके, क्योंकि यहोवा का तेज यहोवा के भवन में भर गया था।
حِينَئِذٍ تَكَلَّمَ سُلَيْمَانُ: «قَالَ ٱلرَّبُّ إِنَّهُ يَسْكُنُ فِي ٱلضَّبَابِ.١٢12
१२तब सुलैमान कहने लगा, “यहोवा ने कहा था, कि मैं घोर अंधकार में वास किए रहूँगा।
إِنِّي قَدْ بَنَيْتُ لَكَ بَيْتَ سُكْنَى، مَكَانًا لِسُكْنَاكَ إِلَى ٱلْأَبَدِ».١٣13
१३सचमुच मैंने तेरे लिये एक वासस्थान, वरन् ऐसा दृढ़ स्थान बनाया है, जिसमें तू युगानुयुग बना रहे।”
وَحَوَّلَ ٱلْمَلِكُ وَجْهَهُ وَبَارَكَ كُلَّ جُمْهُورِ إِسْرَائِيلَ، وَكُلُّ جُمْهُورِ إِسْرَائِيلَ وَاقِفٌ.١٤14
१४तब राजा ने इस्राएल की पूरी सभा की ओर मुँह फेरकर उसको आशीर्वाद दिया; और पूरी सभा खड़ी रही।
وَقَالَ: «مُبَارَكٌ ٱلرَّبُّ إِلَهُ إِسْرَائِيلَ ٱلَّذِي تَكَلَّمَ بِفَمِهِ إِلَى دَاوُدَ أَبِي وَأَكْمَلَ بِيَدِهِ قَائِلًا:١٥15
१५और उसने कहा, “धन्य है इस्राएल का परमेश्‍वर यहोवा! जिस ने अपने मुँह से मेरे पिता दाऊद को यह वचन दिया था, और अपने हाथ से उसे पूरा किया है,
مُنْذُ يَوْمَ أَخْرَجْتُ شَعْبِي إِسْرَائِيلَ مِنْ مِصْرَ لَمْ أَخْتَرْ مَدِينَةً مِنْ جَمِيعِ أَسْبَاطِ إِسْرَائِيلَ لِبِنَاءِ بَيْتٍ لِيَكُونَ ٱسْمِي هُنَاكَ، بَلِ إِنَّمَا ٱخْتَرْتُ دَاوُدَ لِيَكُونَ عَلَى شَعْبِي إِسْرَائِيلَ.١٦16
१६'जिस दिन से मैं अपनी प्रजा इस्राएल को मिस्र से निकाल लाया, तब से मैंने किसी इस्राएली गोत्र का कोई नगर नहीं चुना, जिसमें मेरे नाम के निवास के लिये भवन बनाया जाए; परन्तु मैंने दाऊद को चुन लिया, कि वह मेरी प्रजा इस्राएल का अधिकारी हो।'
وَكَانَ فِي قَلْبِ دَاوُدَ أَبِي أَنْ يَبْنِيَ بَيْتًا لِٱسْمِ ٱلرَّبِّ إِلَهِ إِسْرَائِيلَ.١٧17
१७मेरे पिता दाऊद की यह इच्छा तो थी कि इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा के नाम का एक भवन बनाए।
فَقَالَ ٱلرَّبُّ لِدَاوُدَ أَبِي: مِنْ أَجْلِ أَنَّهُ كَانَ فِي قَلْبِكَ أَنْ تَبْنِيَ بَيْتًا لِٱسْمِي، قَدْ أَحْسَنْتَ بِكَوْنِهِ فِي قَلْبِكَ.١٨18
१८परन्तु यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से कहा, 'यह जो तेरी इच्छा है, कि यहोवा के नाम का एक भवन बनाए, ऐसी इच्छा करके तूने भला तो किया;
إِلَّا إِنَّكَ أَنْتَ لَا تَبْنِي ٱلْبَيْتَ، بَلِ ٱبْنُكَ ٱلْخَارِجُ مِنْ صُلْبِكَ هُوَ يَبْنِي ٱلْبَيْتَ لِٱسْمِي.١٩19
१९तो भी तू उस भवन को न बनाएगा; तेरा जो निज पुत्र होगा, वही मेरे नाम का भवन बनाएगा।'
وَأَقَامَ ٱلرَّبُّ كَلَامَهُ ٱلَّذِي تَكَلَّمَ بِهِ، وَقَدْ قُمْتُ أَنَا مَكَانَ دَاوُدَ أَبِي وَجَلَسْتُ عَلَى كُرْسِيِّ إِسْرَائِيلَ كَمَا تَكَلَّمَ ٱلرَّبُّ، وَبَنَيْتُ ٱلْبَيْتَ لِٱسْمِ ٱلرَّبِّ إِلَهِ إِسْرَائِيلَ،٢٠20
२०यह जो वचन यहोवा ने कहा था, उसे उसने पूरा भी किया है, और मैं अपने पिता दाऊद के स्थान पर उठकर, यहोवा के वचन के अनुसार इस्राएल की गद्दी पर विराजमान हूँ, और इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा के नाम से इस भवन को बनाया है।
وَجَعَلْتُ هُنَاكَ مَكَانًا لِلتَّابُوتِ ٱلَّذِي فِيهِ عَهْدُ ٱلرَّبِّ ٱلَّذِي قَطَعَهُ مَعَ آبَائِنَا عِنْدَ إِخْرَاجِهِ إِيَّاهُمْ مِنْ أَرْضِ مِصْرَ».٢١21
२१और इसमें मैंने एक स्थान उस सन्दूक के लिये ठहराया है, जिसमें यहोवा की वह वाचा है, जो उसने हमारे पुरखाओं को मिस्र देश से निकालने के समय उनसे बाँधी थी।”
وَوَقَفَ سُلَيْمَانُ أَمَامَ مَذْبَحِ ٱلرَّبِّ تُجَاهَ كُلِّ جَمَاعَةِ إِسْرَائِيلَ، وَبَسَطَ يَدَيْهِ إِلَى ٱلسَّمَاءِ٢٢22
२२तब सुलैमान इस्राएल की पूरी सभा के देखते यहोवा की वेदी के सामने खड़ा हुआ, और अपने हाथ स्वर्ग की ओर फैलाकर कहा, हे यहोवा!
وَقَالَ: «أَيُّهَا ٱلرَّبُّ إِلَهُ إِسْرَائِيلَ، لَيْسَ إِلَهٌ مِثْلَكَ فِي ٱلسَّمَاءِ مِنْ فَوْقُ، وَلَا عَلَى ٱلْأَرْضِ مِنْ أَسْفَلُ، حَافِظُ ٱلْعَهْدِ وَٱلرَّحْمَةِ لِعَبِيدِكَ ٱلسَّائِرِينَ أَمَامَكَ بِكُلِّ قُلُوبِهِمْ.٢٣23
२३हे इस्राएल के परमेश्‍वर! तेरे समान न तो ऊपर स्वर्ग में, और न नीचे पृथ्वी पर कोई परमेश्‍वर है: तेरे जो दास अपने सम्पूर्ण मन से अपने को तेरे सम्मुख जानकर चलते हैं, उनके लिये तू अपनी वाचा पूरी करता, और करुणा करता रहता है।
ٱلَّذِي قَدْ حَفِظْتَ لِعَبْدِكَ دَاوُدَ أَبِي مَا كَلَّمْتَهُ بِهِ، فَتَكَلَّمْتَ بِفَمِكَ وَأَكْمَلْتَ بِيَدِكَ كَهَذَا ٱلْيَوْمِ.٢٤24
२४जो वचन तूने मेरे पिता दाऊद को दिया था, उसका तूने पालन किया है, जैसा तूने अपने मुँह से कहा था, वैसा ही अपने हाथ से उसको पूरा किया है, जैसा कि आज है।
وَٱلْآنَ أَيُّهَا ٱلرَّبُّ إِلَهُ إِسْرَائِيلَ ٱحْفَظْ لِعَبْدِكَ دَاوُدَ أَبِي مَا كَلَّمْتَهُ بِهِ قَائِلًا: لَا يُعْدَمُ لَكَ أَمَامِي رَجُلٌ يَجْلِسُ عَلَى كُرْسِيِّ إِسْرَائِيلَ، إِنْ كَانَ بَنُوكَ إِنَّماَ يَحْفَظُونَ طُرُقَهُمْ حَتَّى يَسِيرُوا أَمَامِي كَمَا سِرْتَ أَنْتَ أَمَامِي.٢٥25
२५इसलिए अब हे इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा! इस वचन को भी पूरा कर, जो तूने अपने दास मेरे पिता दाऊद को दिया था, 'तेरे कुल में, मेरे सामने इस्राएल की गद्दी पर विराजनेवाले सदैव बने रहेंगे इतना हो कि जैसे तू स्वयं मुझे सम्मुख जानकर चलता रहा, वैसे ही तेरे वंश के लोग अपनी चालचलन में ऐसी ही चौकसी करें।'
وَٱلْآنَ يَا إِلَهَ إِسْرَائِيلَ فَلْيَتَحَقَّقْ كَلَامُكَ ٱلَّذِي كَلَّمْتَ بِهِ عَبْدَكَ دَاوُدَ أَبِي.٢٦26
२६इसलिए अब हे इस्राएल के परमेश्‍वर अपना जो वचन तूने अपने दास मेरे पिता दाऊद को दिया था उसे सच्चा सिद्ध कर।
لِأَنَّهُ هَلْ يَسْكُنُ ٱللهُ حَقًّا عَلَى ٱلْأَرْضِ؟ هُوَذَا ٱلسَّمَاوَاتُ وَسَمَاءُ ٱلسَّمَاوَاتِ لَا تَسَعُكَ، فَكَمْ بِٱلْأَقَلِّ هَذَا ٱلْبَيْتُ ٱلَّذِي بَنَيْتُ؟٢٧27
२७“क्या परमेश्‍वर सचमुच पृथ्वी पर वास करेगा, स्वर्ग में वरन् सबसे ऊँचे स्वर्ग में भी तू नहीं समाता, फिर मेरे बनाए हुए इस भवन में कैसे समाएगा।
فَٱلْتَفِتْ إِلَى صَلَاةِ عَبْدِكَ وَإِلَى تَضَرُّعِهِ أَيُّهَا ٱلرَّبُّ إِلَهِي، وَٱسْمَعِ ٱلصُّرَاخَ وَٱلصَّلَاةَ ٱلَّتِي يُصَلِّيهَا عَبْدُكَ أَمَامَكَ ٱلْيَوْمَ.٢٨28
२८तो भी हे मेरे परमेश्‍वर यहोवा! अपने दास की प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट की ओर कान लगाकर, मेरी चिल्लाहट और यह प्रार्थना सुन! जो मैं आज तेरे सामने कर रहा हूँ;
لِتَكُونَ عَيْنَاكَ مَفْتُوحَتَيْنِ عَلَى هَذَا ٱلْبَيْتِ لَيْلًا وَنَهَارًا، عَلَى ٱلْمَوْضِعِ ٱلَّذِي قُلْتَ: إِنَّ ٱسْمِي يَكُونُ فِيهِ، لِتَسْمَعَ ٱلصَّلَاةَ ٱلَّتِي يُصَلِّيهَا عَبْدُكَ فِي هَذَا ٱلْمَوْضِعِ.٢٩29
२९कि तेरी आँख इस भवन की ओर अर्थात् इसी स्थान की ओर जिसके विषय तूने कहा है, 'मेरा नाम वहाँ रहेगा,' रात दिन खुली रहें और जो प्रार्थना तेरा दास इस स्थान की ओर करे, उसे तू सुन ले।
وَٱسْمَعْ تَضَرُّعَ عَبْدِكَ وَشَعْبِكَ إِسْرَائِيلَ ٱلَّذِينَ يُصَلُّونَ فِي هَذَا ٱلْمَوْضِعِ، وَٱسْمَعْ أَنْتَ فِي مَوْضِعِ سُكْنَاكَ فِي ٱلسَّمَاءِ، وَإِذَا سَمِعْتَ فَٱغْفِرْ.٣٠30
३०और तू अपने दास, और अपनी प्रजा इस्राएल की प्रार्थना जिसको वे इस स्थान की ओर गिड़गिड़ा के करें उसे सुनना, वरन् स्वर्ग में से जो तेरा निवास-स्थान है सुन लेना, और सुनकर क्षमा करना।
إِذَا أَخْطَأَ أَحَدٌ إِلَى صَاحِبِهِ وَوَضَعَ عَلَيْهِ حَلْفًا لِيُحَلِّفَهُ، وَجَاءَ ٱلْحَلْفُ أَمَامَ مَذْبَحِكَ فِي هَذَا ٱلْبَيْتِ،٣١31
३१“जब कोई किसी दूसरे का अपराध करे, और उसको शपथ खिलाई जाए, और वह आकर इस भवन में तेरी वेदी के सामने शपथ खाए,
فَٱسْمَعْ أَنْتَ فِي ٱلسَّمَاءِ وَٱعْمَلْ وَٱقْضِ بَيْنَ عَبِيدِكَ، إِذْ تَحْكُمُ عَلَى ٱلْمُذْنِبِ فَتَجْعَلُ طَرِيقَهُ عَلَى رَأْسِهِ، وَتُبَرِّرُ ٱلْبَارَّ إِذْ تُعْطِيهِ حَسَبَ بِرِّهِ.٣٢32
३२तब तू स्वर्ग में सुन कर, अर्थात् अपने दासों का न्याय करके दुष्ट को दुष्ट ठहरा और उसकी चाल उसी के सिर लौटा दे, और निर्दोष को निर्दोष ठहराकर, उसके धर्म के अनुसार उसको फल देना।
إِذَا ٱنْكَسَرَ شَعْبُكَ إِسْرَائِيلُ أَمَامَ ٱلْعَدُوِّ لِأَنَّهُمْ أَخْطَأُوا إِلَيْكَ، ثُمَّ رَجَعُوا إِلَيْكَ وَٱعْتَرَفُوا بِٱسْمِكَ وَصَلَّوْا وَتَضَرَّعُوا إِلَيْكَ نَحْوَ هَذَا ٱلْبَيْتِ،٣٣33
३३फिर जब तेरी प्रजा इस्राएल तेरे विरुद्ध पाप करने के कारण अपने शत्रुओं से हार जाए, और तेरी ओर फिरकर तेरा नाम ले और इस भवन में तुझ से गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करे,
فَٱسْمَعْ أَنْتَ مِنَ ٱلسَّمَاءِ وَٱغْفِرْ خَطِيَّةَ شَعْبِكَ إِسْرَائِيلَ، وَأَرْجِعْهُمْ إِلَى ٱلْأَرْضِ ٱلَّتِي أَعْطَيْتَهَا لِآبَائِهِمْ.٣٤34
३४तब तू स्वर्ग में से सुनकर अपनी प्रजा इस्राएल का पाप क्षमा करना: और उन्हें इस देश में लौटा ले आना, जो तूने उनके पुरखाओं को दिया था।
«إِذَا أُغْلِقَتِ ٱلسَّمَاءُ وَلَمْ يَكُنْ مَطَرٌ، لِأَنَّهُمْ أَخْطَأُوا إِلَيْكَ، ثُمَّ صَلَّوْا فِي هَذَا ٱلْمَوْضِعِ وَٱعْتَرَفُوا بِٱسْمِكَ، وَرَجَعُوا عَنْ خَطِيَّتِهِمْ لِأَنَّكَ ضَايَقْتَهُمْ،٣٥35
३५“जब वे तेरे विरुद्ध पाप करें, और इस कारण आकाश बन्द हो जाए, कि वर्षा न होए, ऐसे समय यदि वे इस स्थान की ओर प्रार्थना करके तेरे नाम को मानें जब तू उन्हें दुःख देता है, और अपने पाप से फिरें, तो तू स्वर्ग में से सुनकर क्षमा करना,
فَٱسْمَعْ أَنْتَ مِنَ ٱلسَّمَاءِ وَٱغْفِرْ خَطِيَّةَ عَبِيدِكَ وَشَعْبِكَ إِسْرَائِيلَ، فَتُعَلِّمَهُمُ ٱلطَّرِيقَ ٱلصَّالِحَ ٱلَّذِي يَسْلُكُونَ فِيهِ، وَأَعْطِ مَطَرًا عَلَى أَرْضِكَ ٱلَّتِي أَعْطَيْتَهَا لِشَعْبِكَ مِيرَاثًا.٣٦36
३६और अपने दासों, अपनी प्रजा इस्राएल के पाप को क्षमा करना; तू जो उनको वह भला मार्ग दिखाता है, जिस पर उन्हें चलना चाहिये, इसलिए अपने इस देश पर, जो तूने अपनी प्रजा का भाग कर दिया है, पानी बरसा देना।
إِذَا صَارَ فِي ٱلْأَرْضِ جُوعٌ، إِذَا صَارَ وَبَأٌ، إِذَا صَارَ لَفْحٌ أَوْ يَرَقَانٌ أَوْ جَرَادٌ جَرْدَمٌ، أَوْ إِذَا حَاصَرَهُ عَدُوُّهُ فِي أَرْضِ مُدُنِهِ، فِي كُلِّ ضَرْبَةٍ وَكُلِّ مَرَضٍ،٣٧37
३७“जब इस देश में अकाल या मरी या झुलस हो या गेरूई या टिड्डियाँ या कीड़े लगें या उनके शत्रु उनके देश के फाटकों में उन्हें घेर रखें, अथवा कोई विपत्ति या रोग क्यों न हों,
فَكُلُّ صَلَاةٍ وَكُلُّ تَضَرُّعٍ تَكُونُ مِنْ أَيِّ إِنْسَانٍ كَانَ مِنْ كُلِّ شَعْبِكَ إِسْرَائِيلَ، ٱلَّذِينَ يَعْرِفُونَ كُلُّ وَاحِدٍ ضَرْبَةَ قَلْبِهِ، فَيَبْسُطُ يَدَيْهِ نَحْوَ هَذَا ٱلْبَيْتِ،٣٨38
३८तब यदि कोई मनुष्य या तेरी प्रजा इस्राएल अपने-अपने मन का दुःख जान लें, और गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करके अपने हाथ इस भवन की ओर फैलाए;
فَٱسْمَعْ أَنْتَ مِنَ ٱلسَّمَاءِ مَكَانِ سُكْنَاكَ وَٱغْفِرْ، وَٱعْمَلْ وَأَعْطِ كُلَّ إِنْسَانٍ حَسَبَ كُلِّ طُرُقِهِ كَمَا تَعْرِفُ قَلْبَهُ. لِأَنَّكَ أَنْتَ وَحْدَكَ قَدْ عَرَفْتَ قُلُوبَ كُلِّ بَنِي ٱلْبَشَرِ،٣٩39
३९तो तू अपने स्वर्गीय निवास-स्थान में से सुनकर क्षमा करना, और ऐसा करना, कि एक-एक के मन को जानकर उसकी समस्त चाल के अनुसार उसको फल देना: तू ही तो सब मनुष्यों के मन के भेदों का जानने वाला है।
لِكَيْ يَخَافُوكَ كُلَّ ٱلْأَيَّامِ ٱلَّتِي يَحْيَوْنَ فِيهَا عَلَى وَجْهِ ٱلْأَرْضِ ٱلَّتِي أَعْطَيْتَ لِآبَائِنَا.٤٠40
४०तब वे जितने दिन इस देश में रहें, जो तूने उनके पुरखाओं को दिया था, उतने दिन तक तेरा भय मानते रहें।
وَكَذَلِكَ ٱلْأَجْنَبِيُّ ٱلَّذِي لَيْسَ مِنْ شَعْبِكَ إِسْرَائِيلَ هُوَ، وَجَاءَ مِنْ أَرْضٍ بَعِيدَةٍ مِنْ أَجْلِ ٱسْمِكَ،٤١41
४१“फिर परदेशी भी जो तेरी प्रजा इस्राएल का न हो, जब वह तेरा नाम सुनकर, दूर देश से आए,
لِأَنَّهُمْ يَسْمَعُونَ بِٱسْمِكَ ٱلْعَظِيمِ وَبِيَدِكَ ٱلْقَوِيَّةِ وَذِرَاعِكَ ٱلْمَمْدُودَةِ، فَمَتَى جَاءَ وَصَلَّى فِي هَذَا ٱلْبَيْتِ،٤٢42
४२वह तो तेरे बड़े नाम और बलवन्त हाथ और बढ़ाई हुई भुजा का समाचार पाए; इसलिए जब ऐसा कोई आकर इस भवन की ओर प्रार्थना करे,
فَٱسْمَعْ أَنْتَ مِنَ ٱلسَّمَاءِ مَكَانِ سُكْنَاكَ، وَٱفْعَلْ حَسَبَ كُلِّ مَا يَدْعُو بِهِ إِلَيْكَ ٱلْأَجْنَبِيُّ، لِكَيْ يَعْلَمَ كُلُّ شُعُوبِ ٱلْأَرْضِ ٱسْمَكَ، فَيَخَافُوكَ كَشَعْبِكَ إِسْرَائِيلَ، وَلِكَيْ يَعْلَمُوا أَنَّهُ قَدْ دُعِيَ ٱسْمُكَ عَلَى هَذَا ٱلْبَيْتِ ٱلَّذِي بَنَيْتُ.٤٣43
४३तब तू अपने स्वर्गीय निवास-स्थान में से सुन, और जिस बात के लिये ऐसा परदेशी तुझे पुकारे, उसी के अनुसार व्यवहार करना जिससे पृथ्वी के सब देशों के लोग तेरा नाम जानकर तेरी प्रजा इस्राएल के समान तेरा भय मानें, और निश्चय जानें, कि यह भवन जिसे मैंने बनाया है, वह तेरा ही कहलाता है।
«إِذَا خَرَجَ شَعْبُكَ لِمُحَارَبَةِ عَدُوِّهِ فِي ٱلطَّرِيقِ ٱلَّذِي تُرْسِلُهُمْ فِيهِ، وَصَلَّوْا إِلَى ٱلرَّبِّ نَحْوَ ٱلْمَدِينَةِ ٱلَّتِي ٱخْتَرْتَهَا وَٱلْبَيْتِ ٱلَّذِي بَنَيْتُهُ لِٱسْمِكَ،٤٤44
४४“जब तेरी प्रजा के लोग जहाँ कहीं तू उन्हें भेजे, वहाँ अपने शत्रुओं से लड़ाई करने को निकल जाएँ, और इस नगर की ओर जिसे तूने चुना है, और इस भवन की ओर जिसे मैंने तेरे नाम पर बनाया है, यहोवा से प्रार्थना करें,
فَٱسْمَعْ مِنَ ٱلسَّمَاءِ صَلَاتَهُمْ وَتَضَرُّعَهُمْ وَٱقْضِ قَضَاءَهُمْ.٤٥45
४५तब तू स्वर्ग में से उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनकर उनका न्याय कर।
إِذَا أَخْطَأُوا إِلَيْكَ، لِأَنَّهُ لَيْسَ إِنْسَانٌ لَا يُخْطِئُ، وَغَضِبْتَ عَلَيْهِمْ وَدَفَعْتَهُمْ أَمَامَ ٱلْعَدُوِّ وَسَبَاهُمْ، سَابُوهُمْ إِلَى أَرْضِ ٱلْعَدُوِّ، بَعِيدَةً أَوْ قَرِيبَةً،٤٦46
४६“निष्पाप तो कोई मनुष्य नहीं है: यदि ये भी तेरे विरुद्ध पाप करें, और तू उन पर कोप करके उन्हें शत्रुओं के हाथ कर दे, और वे उनको बन्दी बनाकर अपने देश को चाहे वह दूर हो, चाहे निकट, ले जाएँ,
فَإِذَا رَدُّوا إِلَى قُلُوبِهِمْ فِي ٱلْأَرْضِ ٱلَّتِي يُسْبَوْنَ إِلَيْهَا وَرَجَعُوا وَتَضَرَّعُوا إِلَيْكَ فِي أَرْضِ سَبْيِهِمْ قَائِلِينَ: قَدْ أَخْطَأْنَا وَعَوَّجْنَا وَأَذْنَبْنَا.٤٧47
४७और यदि वे बँधुआई के देश में सोच विचार करें, और फिरकर अपने बन्दी बनानेवालों के देश में तुझ से गिड़गिड़ाकर कहें, 'हमने पाप किया, और कुटिलता और दुष्टता की है;'
وَرَجَعُوا إِلَيْكَ مِنْ كُلِّ قُلُوبِهِمْ وَمِنْ كُلِّ أَنْفُسِهِمْ فِي أَرْضِ أَعْدَائِهِمْ ٱلَّذِينَ سَبَوْهُمْ، وَصَلَّوْا إِلَيْكَ نَحْوَ أَرْضِهِمْ ٱلَّتِي أَعْطَيْتَ لِآبَائِهِمْ، نَحْوَ ٱلْمَدِينَةِ ٱلَّتِي ٱخْتَرْتَ وَٱلْبَيْتِ ٱلَّذِي بَنَيْتُ لِٱسْمِكَ،٤٨48
४८और यदि वे अपने उन शत्रुओं के देश में जो उन्हें बन्दी करके ले गए हों, अपने सम्पूर्ण मन और सम्पूर्ण प्राण से तेरी ओर फिरें और अपने इस देश की ओर जो तूने उनके पुरखाओं को दिया था, और इस नगर की ओर जिसे तूने चुना है, और इस भवन की ओर जिसे मैंने तेरे नाम का बनाया है, तुझ से प्रार्थना करें,
فَٱسْمَعْ فِي ٱلسَّمَاءِ مَكَانِ سُكْنَاكَ صَلَاتَهُمْ وَتَضَرُّعَهُمْ وَٱقْضِ قَضَاءَهُمْ،٤٩49
४९तो तू अपने स्वर्गीय निवास-स्थान में से उनकी प्रार्थना और गिड़गिड़ाहट सुनना; और उनका न्याय करना,
وَٱغْفِرْ لِشَعْبِكَ مَا أَخْطَأُوا بِهِ إِلَيْكَ، وَجَمِيعَ ذُنُوبِهِمِ ٱلَّتِي أَذْنَبُوا بِهَا إِلَيْكَ، وَأَعْطِهِمْ رَحْمَةً أَمَامَ ٱلَّذِينَ سَبَوْهُمْ فَيَرْحَمُوهُمْ،٥٠50
५०और जो पाप तेरी प्रजा के लोग तेरे विरुद्ध करेंगे, और जितने अपराध वे तेरे विरुद्ध करेंगे, सब को क्षमा करके, उनके बन्दी करनेवालों के मन में ऐसी दया उपजाना कि वे उन पर दया करें।
لِأَنَّهُمْ شَعْبُكَ وَمِيرَاثُكَ ٱلَّذِينَ أَخْرَجْتَ مِنْ مِصْرَ، مِنْ وَسَطِ كُورِ ٱلْحَدِيدِ.٥١51
५१क्योंकि वे तो तेरी प्रजा और तेरा निज भाग हैं जिन्हें तू लोहे के भट्ठे के मध्य में से अर्थात् मिस्र से निकाल लाया है।
لِتَكُونَ عَيْنَاكَ مَفْتُوحَتَيْنِ نَحْوَ تَضَرُّعِ عَبْدِكَ وَتَضَرُّعِ شَعْبِكَ إِسْرَائِيلَ، فَتُصْغِيَ إِلَيْهِمْ فِي كُلِّ مَا يَدْعُونَكَ،٥٢52
५२इसलिए तेरी आँखें तेरे दास की गिड़गिड़ाहट और तेरी प्रजा इस्राएल की गिड़गिड़ाहट की ओर ऐसी खुली रहें, कि जब-जब वे तुझे पुकारें, तब-तब तू उनकी सुन ले;
لِأَنَّكَ أَنْتَ أَفْرَزْتَهُمْ لَكَ مِيرَاثًا مِنْ جَمِيعِ شُعُوبِ ٱلْأَرْضِ، كَمَا تَكَلَّمْتَ عَنْ يَدِ مُوسَى عَبْدِكَ عِنْدَ إِخْرَاجِكَ آبَاءَنَا مِنْ مِصْرَ يَاسَيِّدِي ٱلرَّبَّ».٥٣53
५३क्योंकि हे प्रभु यहोवा अपने उस वचन के अनुसार, जो तूने हमारे पुरखाओं को मिस्र से निकालने के समय अपने दास मूसा के द्वारा दिया था, तूने इन लोगों को अपना निज भाग होने के लिये पृथ्वी की सब जातियों से अलग किया है।”
وَكَانَ لَمَّا ٱنْتَهَى سُلَيْمَانُ مِنَ ٱلصَّلَاةِ إِلَى ٱلرَّبِّ بِكُلِّ هَذِهِ ٱلصَّلَاةِ وَٱلتَّضَرُّعِ، أَنَّهُ نَهَضَ مِنْ أَمَامِ مَذْبَحِ ٱلرَّبِّ، مِنَ ٱلْجُثُوِّ عَلَى رُكْبَتَيْهِ، وَيَدَاهُ مَبْسُوطَتَانِ نَحْوَ ٱلسَّمَاءِ،٥٤54
५४जब सुलैमान यहोवा से यह सब प्रार्थना गिड़गिड़ाहट के साथ कर चुका, तब वह जो घुटने टेके और आकाश की ओर हाथ फैलाए हुए था, यहोवा की वेदी के सामने से उठा,
وَوَقَفَ وَبَارَكَ كُلَّ جَمَاعَةِ إِسْرَائِيلَ بِصَوْتٍ عَالٍ قَائِلًا:٥٥55
५५और खड़ा हो, समस्त इस्राएली सभा को ऊँचे स्वर से यह कहकर आशीर्वाद दिया,
«مُبَارَكٌ ٱلرَّبُّ ٱلَّذِي أَعْطَى رَاحَةً لِشَعْبِهِ إِسْرَائِيلَ حَسَبَ كُلِّ مَا تَكَلَّمَ بِهِ، وَلَمْ تَسْقُطْ كَلِمَةٌ وَاحِدَةٌ مِنْ كُلِّ كَلَامِهِ ٱلصَّالِحِ ٱلَّذِي تَكَلَّمَ بِهِ عَنْ يَدِ مُوسَى عَبْدِهِ.٥٦56
५६“धन्य है यहोवा, जिस ने ठीक अपने कथन के अनुसार अपनी प्रजा इस्राएल को विश्राम दिया है, जितनी भलाई की बातें उसने अपने दास मूसा के द्वारा कही थीं, उनमें से एक भी बिना पूरी हुए नहीं रही।
لِيَكُنِ ٱلرَّبُّ إِلَهُنَا مَعَنَا كَمَا كَانَ مَعَ آبَائِنَا فَلَا يَتْرُكَنَا وَلَا يَرْفُضَنَا.٥٧57
५७हमारा परमेश्‍वर यहोवा जैसे हमारे पुरखाओं के संग रहता था, वैसे ही हमारे संग भी रहे, वह हमको त्याग न दे और न हमको छोड़ दे।
لِيَمِيلَ بِقُلُوبِنَا إِلَيْهِ لِكَيْ نَسِيرَ فِي جَمِيعِ طُرُقِهِ وَنَحْفَظَ وَصَايَاهُ وَفَرَائِضَهُ وَأَحْكَامَهُ ٱلَّتِي أَوْصَى بِهَا آبَاءَنَا.٥٨58
५८वह हमारे मन अपनी ओर ऐसा फिराए रखे, कि हम उसके सब मार्गों पर चला करें, और उसकी आज्ञाएँ और विधियाँ और नियम जिन्हें उसने हमारे पुरखाओं को दिया था, नित माना करें।
وَلِيَكُنْ كَلَامِي هَذَا ٱلَّذِي تَضَرَّعْتُ بِهِ أَمَامَ ٱلرَّبِّ قَرِيبًا مِنَ ٱلرَّبِّ إِلَهِنَا نَهَارًا وَلَيْلًا، لِيَقْضِيَ قَضَاءَ عَبْدِهِ وَقَضَاءَ شَعْبِهِ إِسْرَائِيلَ، أَمْرَ كُلِّ يَوْمٍ فِي يَوْمِهِ.٥٩59
५९और मेरी ये बातें जिनकी मैंने यहोवा के सामने विनती की है, वह दिन और रात हमारे परमेश्‍वर यहोवा के मन में बनी रहें, और जैसी प्रतिदिन आवश्यकता हो वैसा ही वह अपने दास का और अपनी प्रजा इस्राएल का भी न्याय किया करे,
لِيَعْلَمَ كُلُّ شُعُوبِ ٱلْأَرْضِ أَنَّ ٱلرَّبَّ هُوَ ٱللهُ وَلَيْسَ آخَرُ.٦٠60
६०और इससे पृथ्वी की सब जातियाँ यह जान लें, कि यहोवा ही परमेश्‍वर है; और कोई दूसरा नहीं।
فَلْيَكُنْ قَلْبُكُمْ كَامِلًا لَدَى ٱلرَّبِّ إِلَهِنَا إِذْ تَسِيرُونَ فِي فَرَائِضِهِ وَتَحْفَظُونَ وَصَايَاهُ كَهَذَا ٱلْيَوْمِ».٦١61
६१तो तुम्हारा मन हमारे परमेश्‍वर यहोवा की ओर ऐसी पूरी रीति से लगा रहे, कि आज के समान उसकी विधियों पर चलते और उसकी आज्ञाएँ मानते रहो।”
ثُمَّ إِنَّ ٱلْمَلِكَ وَجَمِيعَ إِسْرَائِيلَ مَعَهُ ذَبَحُوا ذَبَائِحَ أَمَامَ ٱلرَّبِّ،٦٢62
६२तब राजा समस्त इस्राएल समेत यहोवा के सम्मुख मेलबलि चढ़ाने लगा।
وَذَبَحَ سُلَيْمَانُ ذَبَائِحَ ٱلسَّلَامَةِ ٱلَّتِي ذَبَحَهَا لِلرَّبِّ: مِنَ ٱلْبَقَرِ ٱثْنَيْنِ وَعِشْرِينَ أَلْفًا، وَمِنَ ٱلْغَنَمِ مِئَةَ أَلْفٍ وَعِشْرِينَ أَلْفًا، فَدَشَّنَ ٱلْمَلِكُ وَجَمِيعُ بَنِي إِسْرَائِيلَ بَيْتَ ٱلرَّبِّ.٦٣63
६३और जो पशु सुलैमान ने मेलबलि में यहोवा को चढ़ाए, वे बाईस हजार बैल और एक लाख बीस हजार भेड़ें थीं। इस रीति राजा ने सब इस्राएलियों समेत यहोवा के भवन की प्रतिष्ठा की।
فِي ذَلِكَ ٱلْيَوْمِ قَدَّسَ ٱلْمَلِكُ وَسَطَ ٱلدَّارِ ٱلَّتِي أَمَامَ بَيْتِ ٱلرَّبِّ، لِأَنَّهُ قَرَّبَ هُنَاكَ ٱلْمُحْرَقَاتِ وَٱلتَّقْدِمَاتِ وَشَحْمَ ذَبَائِحِ ٱلسَّلَامَةِ، لِأَنَّ مَذْبَحَ ٱلنُّحَاسِ ٱلَّذِي أَمَامَ ٱلرَّبِّ كَانَ صَغِيرًا عَنْ أَنْ يَسَعَ ٱلْمُحْرَقَاتِ وَٱلتَّقْدِمَاتِ وَشَحْمَ ذَبَائِحِ ٱلسَّلَامَةِ.٦٤64
६४उस दिन राजा ने यहोवा के भवन के सामनेवाले आँगन के मध्य भी एक स्थान पवित्र किया और होमबलि, और अन्नबलि और मेलबलियों की चर्बी वहीं चढ़ाई; क्योंकि जो पीतल की वेदी यहोवा के सामने थी, वह उनके लिये छोटी थी।
وَعَيَّدَ سُلَيْمَانُ ٱلْعِيدَ فِي ذَلِكَ ٱلْوَقْتِ وَجَمِيعُ إِسْرَائِيلَ مَعَهُ، جُمْهُورٌ كَبِيرٌ مِنْ مَدْخَلِ حَمَاةَ إِلَى وَادِي مِصْرَ، أَمَامَ ٱلرَّبِّ إِلَهِنَا سَبْعَةَ أَيَّامٍ وَسَبْعَةَ أَيَّامٍ، أَرْبَعَةَ عَشَرَ يَوْمًا.٦٥65
६५अतः सुलैमान ने और उसके संग समस्त इस्राएल की एक बड़ी सभा ने जो हमात के प्रवेशद्वार से लेकर मिस्र के नाले तक के सब देशों से इकट्ठी हुई थी, दो सप्ताह तक अर्थात् चौदह दिन तक हमारे परमेश्‍वर यहोवा के सामने पर्व को माना।
وَفِي ٱلْيَوْمِ ٱلثَّامِنِ صَرَفَ ٱلشَّعْبَ، فَبَارَكُوا ٱلْمَلِكَ وَذَهَبُوا إِلَى خِيَمِهِمْ فَرِحِينَ وَطَيِّبِي ٱلْقُلُوبِ، لِأَجْلِ كُلِّ ٱلْخَيْرِ ٱلَّذِي عَمِلَ ٱلرَّبُّ لِدَاوُدَ عَبْدِهِ وَلِإِسْرَائِيلَ شَعْبِهِ.٦٦66
६६फिर आठवें दिन उसने प्रजा के लोगों को विदा किया। और वे राजा को धन्य, धन्य, कहकर उस सब भलाई के कारण जो यहोवा ने अपने दास दाऊद और अपनी प्रजा इस्राएल से की थी, आनन्दित और मगन होकर अपने-अपने डेरे को चले गए।